शनिवार, 21 नवंबर 2009

gyan tatva.

Aapko kabhi uske liye nahi pachhtana chahiye jo apko nahi mila,aapko ye sauchna chahiye ki aapko pachhtane me time barwaad karne me kya khona padsakta hai..har beeta hua pal kabhi bapis nahi aata,aap klpna kijye zara sauchiye sauchiye ki ek bahut hi vehtreen din jab aap kahin sundar sthaan par ghoom rahe the aur aapko vahan bahut aanand aaya tha,kya aap un kshano ko kabhi vapis paa sakte hain,kisi bhi kimat par...agar swaym bhagwaan bhi chahen to bhi nahi..isiliye aapse kahta hun,ki aapko us beete huye palon ke liye nahi pachhtana chahiye jo aapke liye bane hi nahi the..isse aapka mulya aapke jivan ka mulya aur aapki yogyta ka mulya kam hota hai,,milta kuchh nahi..isko aap aise bhi sauch sakte hain..ki pachhtana uske liye chaiye jo aapko nahi mila aur aapse kshreshtha tha,,aapse achchha tha,,kyonki vastava me dukh usi ke khone ka hota hai jo aapke liye aapse jayada mulyawaan aur kshreshtha hota hai,na ki aapse kamtar ya nimnstar ke liye,to aap swaym ka mulyankan kijyeaur sauchiye ki jab aapne kisi ko dhaukha nahi diya hamesha aap uske liye wafadaar rahe,apne vachan se peechhe nahi hate to vah vyakti aapse kshreshtha kaise ho sakta hai jo aapko chhaudkar chala gaya hai,vah to aapki apeksha kam mulyawaan aur nimnstriya hoga to aapko aise kisi mulyaheen aur apne vachan par na tikne waale vyakti ke liye aap kyon raute hai,uske liye kyon pareshaan hote hain,swaym ko kyon baarwaad karte hain jo aapke star ka tha hi nahi..jara sauchiye agar aisa vyakti aapke jivan me saath rahta aur kabhi aise maudpar aapko dhauka deta jab aapke aur aapke sampurna jivan ke liye ghatak aur vinashkaari hota tab aap kya karte...vaise bhi dil tutna alag baat hai..jivan ke saath anyaan karna alag baat hai..isiliye meri baat ko dhyaan se suniye aur mere saath meri traha aage badhiye..mai jivan ke har palon me har kathinaayee me aapko salah aur sahayta deta rahunga..

सोमवार, 16 नवंबर 2009

ज्ञान तत्त्व!

   पतित लोकतंत्र की काली पताका::::::मालेगाँव में पोप का प्रकोप::::::::बुद्धि और महत्वाकांक्षा दो ऐसे मानवीय गुण हैं जो कभी भी दिशा भटक जाने पर गुण से दुर्गुण बन जाते हैं.इन्ही गुणों के बल पर अखिल सृष्टि का प्रति एक मानव अकेले ही सारे विश्व पर शाशन करने की अवांछित और अस्वीकार्य कोशिश करने लगता है..वास्तव में यही एक मात्र वो तथ्य है जो संपूर्ण विश्व में अनेको युद्धों और करोड़ो लोगों की असमय मृत्यु का कारण बना.इसी महत्वाकांक्षा रूपी राक्षशी ने हम मानवों के कितने ही महान और प्रतिभाशाली पूर्वजों को छीन लिया है..और संभवतः सबसे ज्यादा हानी भारत वासीयों की हुयी है.यह होते हुए भी की हम अहिंसा के समर्थक रहे हैं,साथ ही संपूर्ण विश्व पर शाशन करने की महत्वाकांक्षा भी हमारे किसी पूर्वज ने नहीं की.हमारे भारत राष्ट्र की भोगोलिक सीमायें जहाँ तक रही हैं वहीँ तक हमारे शाशकों में शाशन करने की महत्वाकांक्षा रही है.हम अपनी सीमाओं से कभी बाहर नहीं गए,और इस द्रष्टि से कभी भी हमने ईश्वर द्बारा निर्धारित मानवीय मर्यादा को खंडित नहीं किया.विश्व के एक मात्र महानतम धर्म के मानने वाले और समर्थक होने के बाद भी भारतियों ने -कभी भी भारत के बहार अपने महान धर्म का आक्रामक और बलपूर्वक प्रचार--प्रसार करने का औचित्य नहीं समझा.प्रति एक भारतवासी में विश्वविजेता,,और प्रति एक धर्म गुरु में ईसा मसीह,मुहम्मद साहब,ज़र्थ्रुस्त्र,और कन्फियुशियश जैसी अद्यात्मिक योग्यता होने के बाद भी हमने कभी केवल अपने हित के लिए किसी विदेशी राष्ट्र में अपनी विचारधारा को कभी वहां की जनता पर नहीं थोपा,क्योकि इससे किसी अन्य राष्ट्र में दुसरे हानिकारक राष्ट्र का जन्म हो सकता था,जो निश्चित रूप से उस राष्ट्र के अस्तित्व के लिए विनाशक सिद्ध होता.इस तथ्य को हमारे महान पूर्वजों ने समझा और किसी भी प्रकार के अनावश्यक प्रयास नहीं किये.यही तथ्य अन्य विदेशी पंथो ने नहीं समझा की मनुष्य की असीमित महत्त्वाकांक्षा होने का अलग अर्थ है,और उन्हें पूरा करना असंभव है.मुस्लिम पंथियों के बाद अब भारत वर्ष में यही प्रयास ईसा मसीह के प्रवर्तक और पूजक---तथा पोप के अनुयायियों द्बारा किया जा रहा है.भारत में आये दिन कहीं न कहीं विस्फोट और आंतंक वादी घटनाएँ होती रहती हैं,जिनमे अनेक निरपराध और निर्दोष लोग मारे जाते हैं.गाधी परिवार के कई लोग आतंकवादियों द्बारा मारे जा चुके हैं.
 ----क्योंकि इन लोगो ने सदैव आतंक वाद के विरुद्ध कड़ा द्रष्टिकोण अपनाया,संभवतः इसीलिए इन लोगो को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था.यह वह समय था जब भारत में आंशिक आतंक वाद था,आज जबकि यह आतंक वाद आंशिक से संपूर्ण बन चूका है तब स्तिथि यह है कि आतंकवादी जब-जब नेताओं को जान से मारने कि धमकी देते हैं,और अपने विरुद्ध कोई कार्य वाही करने से मना करते हैं तब--तब हमारे देश कि सरकारें जो वास्तव में हमारी सरकारें नहीं हैं,,और नेता जो केवल अपने परिवारों का नेतृत्व करने के योग्य भी नहीं हैं,इन आतंकवादियों से डरकर उनसे समझोता कर लेते हैं और अपनी जान बचाने के लिए ये लोग उस भारतीय जनता को मरने के लिए छोड़ देते हैं जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी न तो स्वयं सरकार ले पा रही है और न ही स्वयम् जनता ही अपनी सुरक्षा की चिंता करती है.वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर पर एक महान राजनीतिक संकट उत्त्पन्न हो गया है.आतंकवाद के प्रभावशाली राजनीतिक मुद्दे के कारण पोप समर्थित सोनिया गाँधी की विदेशी हितों के अनुसार चलने वाली कांग्रेसी सरकार के बदले जाने का साथ ही कांग्रेस के अन्तःपतन का समय निकट है.उडीसा और कर्णाटक में पोपवादियों और ईसाईयों के विरुद्ध उनके द्बारा छलपूर्वक किये जा रहे धर्म परिवर्तन का कुछ राष्ट्रवादी संगठनों ने विरोध किया,जिसके कारण पॉप की पुजारिन सोनिया गाँधी बौखला गयी,और लालू---पासवान जैसे संकीर्णता वादी लोगों के दबाब में राष्ट्रीय स्वयम् सेवक संघ,बजरंगदल,और विश्व हिन्दू परिषद् के क्रय कर्ताओं के विरुद्ध कार्यवाही में लग गयी.वास्तव में तथाकथित सेकुलरवादियों ने कांग्रेस सरकार पर लगातार 5 वर्षों से मुख्य विपक्षी दल भाजपा समर्थक राष्ट्रवादी संगठनो को प्रतिवंधित करने का दबाव बनाया जा रहा था,जिससे की कई राज्यों में इन लोगो की जो सत्ता समाप्त हो गयी है उसको ये लोग वापस पा सकें.वाही दबाव अब वास्तविकता में बदल गयी है,परिणाम स्वरुप किसी भी दिन इन राष्ट्रवादी संगठनों को प्रतिबंधित करने क समाचार आपको जल्दी ही किसी भी दिन सुनने को मिलेगा.इससे धुर राष्ट्र वादी और आतंक विरोधी राजनितिक लोगों को सीधी हानि पहुंचनी निश्चित है,,जिसका सीधा लाभ आतंक परस्त और भारत विरोधी राजनितिक दलों को पहुंचेगा,कोई भी बुद्धिमान भारतवासी ये तो सोच हो सकता है की आखिर आज तक किसी भी विदेशी आतंक वादी का नार्को परिक्षण नहीं किया गयातब भला क्यों अभी तक अंतिम परिणाम पर न पहुँचने के बाद भी सुरक्षा एजेंसियां साध्वी प्रज्ञा और अमृतानंद आदि साधू संतों का नार्को टेस्ट बार-बार कर रही है.एक और महत्वपूर्ण बात है की इन सारे विस्फोटों की जिम्मेदारी पहले ही सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन ले चुके हैं.साथ ही कानपुर विस्फोट के एक दो दिन बाद बिना किसी जांच और परिणाम के श्री प्रकाश जायसवाल और सलमान खुर्शीद ने वक्तव्य दिया था की इन विस्फोटों में राष्ट्रीय स्वयम् सेवक संघ तथा बजरंग दल का हाथ है,आखिर कैसे उन्होंने ये बात बिना किसी जांच के कह दी थी.इसका अर्थ ये हुआ की ये विस्फोट राजनितिक लाभ पाने के लिए करवायें हो और नाम अन्य लोगो का ले लिया हो.बाद में सबूत बनाकर घटना क्रम को ऐसे रूप दिया गया की इसमें राष्ट्रवादी संगठनों के लोगों को फंसाया जा सके.      हो सकता है की इसमें कुछ कट्टरपंथी हिन्दू शामिल भी हो..जिसकी सम्भावना तो वैसे नहीं है,लेकिन इतने छोटे विस्फोटों के लिए हिन्दू समाज से इतने बड़े स्तर पर जो धर--पकड़ हो रही है उसका एक ही अर्थ है की इस गैरराष्ट्रवादी कांग्रेस सरकार की नियत सिर्फ चुनाव जीतने के लिए बहुत ख़राब हो गयी लगती है इसमें केवल उच्चवर्गीय ब्राहमण और क्षत्रिय समाज के लोगों को ही जेल भेजने और प्रताड़ित करने का प्रयास हो रहा है.इस बार कुछ सैन्य अधिकारियों को भी इसमें शामिल किया गया है..अगर ऐसा है तो..[जो की नहीं होना चाहिए]...तब वास्तव में स्तिथि बहुत ही भयावह है..जिससे या तो देश खंडित होगा या फिर सारी भारतीय सेना विद्रोही होकर सत्ता का अपहरण कर सकती है.हो सकता है की यह भारत के कई पड़ोसी देशों की तरह तानाशाही शाशन का संकेत भी हो...जिसकी बहुत ज्यादा सम्भावना है...तो ये बात निश्चित रूप से राष्ट्रीय हितों के लिए अत्याधिक प्रतिकूल और महाविनाशक है.तथाकथित विस्फोटों में राष्ट्रवादी संगठनों को उत्तारदायी ठहराना और हर छोटी से छोटी गुप्त सुचना को भी मीडिया को दे देना,,सीधे--सीधे सरकार की गलत नियत को प्रकट करता है.जिससे भारत की जन-धन की हानि हो,,हिन्दू--मुस्लिम में नफरत फैले और दंगे हों..इस स्तिथि में सरकार चाहे सोनिया गाँधी की बने या फिर आडवाणी की,,हानि सिर्फ भारत वर्ष की होगी और लाभ सिर्फ ईसाईयत और पॉप तथा उसके समर्थकों का ही होगा. इसका संकेत इस बात से भी मिलता है कि बार--बार विस्फोटों में R.D.X. के प्रयोग की बात की जा रही है मगर..इससे पहले की जांच रिपोर्टों में यह बात पहले ही कही जा चुकी है कि..इन विस्फोटों में R.D.X. का प्रयोग नहीं किया गया था...वल्कि किसी और विस्फोटक का प्रयोग हुआ था...जैसे की समझोता एक्सप्रेस में अमोनियम नाईट्रेट का प्रयोग किया गया था...तब A.T.S. तथा दूसरी एजेंसियों की नियत पर सभी लोगों को संदेह होना निश्चित है और अब समय आ गया है की इन जांच एजेंसियों से सच्चाई की माँग की जाये...दूसरी एक और बात ये की कर्नेल पुरोहित ने सेना के गोदाम से 60 किलों R.D.X. चुराया था....इन तथाकथित विस्फोटों की गंभीरता को देखते हुए इनमे अधिक से अधिक 15 किलो R.D.X.का ही प्रयोग हुआ होगा तब...बचा हुआ 45 किलो R.D.X.कहाँ गया,और इन लोगो ने आखिर इतने वर्षों में उसका प्रयोग कहीं पर क्यों नहीं किया.....आने वाली जांचों में क्या ऐसा भी हो सकता है की..पिछले कई वर्षों से जो सारे विस्फोट होते रहे हैं..उनमे धीरे --धीरे इन हिन्दू राष्ट्रवादियों को ही उत्तरदायी ठहरा दिया जायेगा और अभी तक पकड़े गए सभी देशी और विदेशी आतंकवादियों को छोड़ दिया जायेगा !इन घटनाओं में एक और बात यह ध्यान देने योग्य है कि....इनका मुख्या सूत्र धार तो साध्वी प्रज्ञा सिंह और कुछ सैन्य अधिकारियों को बताया जा रहा है..जबकि विस्फोटक रखने के लिए कुछ मुस्लिम युवाओं को उत्तरदायी बताया जा रहा है...ये दोनों ही एक दुसरे की विरोधी बाते हैं...आखिर ये कैसे संभव है की ये राष्ट्र वादी हिन्दू संगठन अविश्वसनीय होते हुए भी भला क्यों मुस्लिम युवाओ का सहयोग लेंगे ...जबकि कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इतनी बात तो सोच ही सकता है कि कभी भी ये मुस्लिम युवा किसी भी कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन या विदेशी आतंकवादी संगठन को इस बारे में बता देंगे..इसके अर्थ हुआ कि ये विस्फोट किये तो हैं मुस्लिम संगठनो ने ही..मगर सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए ही हिन्दू संगठनों को फंसाया जा रहा है...एक और महत्वपूर्ण बात ये है की इस प्रकार कि कार्यवाही केवल वहीँ की सरकारें और सुरक्षा एजेंसियां कर रही हैं..जहाँ पर कांग्रेस और उसके सहयोगियों की सरकार हैं...अन्य किसी भी राज्य में ऐसी कोई कार्यवाही नहीं किया जाना भी सरकारी तंत्र के दुरूपयोग को दर्शाता है !यह भी कहा जा रहा है कि इन विस्फोटों में हिन्दू संगठनों ने सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन का भी सहयोग लिया है....क्या मुस्लिमो के विरुद्ध विस्फोट करने के लिए ये कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन कभी हिन्दू संगठनों का सहयोग कर सकते हैं?!अगर ऐसा होता तो विस्फोटक भी इन्ही मुस्लिम संगठनों से लिए होते न कि सैन्य गोदाम से....अब भविष्य में ये हो सकता है कि सारे वास्तविक आतंकवादियों को छोड दिया जाये और हिन्दू राष्ट्र वादी संगठनों के लोगो को इनकी जगह जेल भेज दिया जाए...आतंकवाद,महंगाई,भ्रष्टाचार,बेरोजगारी,..और कम होती आर्थिक विकास दर जैसे प्रखर मुद्दों पर घिरी हुयी पॉप और इटली समर्थक,सोनिया कि कांग्रेस के लिए बचने का यही एक मात्र उपाय सूझ रहा है....क्योंकि..आतंकवाद..महंगाई...भ्रष्टाचार,,..बेरोजगारी..को तो सरकार रोक नहीं सकती थी...तब विपक्षी दल भा.ज.पा.को सत्ता में आने से रोकने का एक मात्र यही दमदार उपाय आज कांग्रेस और सोनिया गाँधी को देखाई दे रहा था..जो अंततः इन्होने हथकंडे के रूप में प्रयोग किया है... भले ही आप सब लोग मिलकर आने वाले लोकसभा चुनाव में भा.ज.पा.के पक्ष में वोटिंग करके उसको सत्ता सौंप दें...मगर आने वाले भविष्य के लिए ये एक अशुभ परम्परा बन जायेगी,अगर आप युवाओं ने भविष्य के लिए राष्ट्र को सुरक्षित बनाये रखने के लिए स्वयम् आगे आकर नेत्रत्व करने की योग्यता अपने अन्दर विकसित नहीं की तो निश्चित ही राष्ट्र खंड---खंड हो जायेगा..आप सब लोग आगे आईये और स्वयम् को राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय आवश्यकता के अनुसार नेत्रत्व करने के लिए तैयार कीजिये और भारत वर्ष को खंडित होने से बचने में हमारा सहयोग कीजये.
-राजनीति के मूक समर्थक मत बने रहिये:---राजनीति के मूक समर्थक कौन हैं,और मेरा संकेत किन लोगो की और है ये बात समझने से पहले इस बात को समझना जरूरी है की आखिर राजनीति वास्तव में क्या है?....राजनीति का वास्तविक अर्थ होता है राज्य की नीति,राष्ट्र की नीति,या फिर राजा और प्रजा की नीति,आज के परिवेश में जो राजनीति का स्वरूप आप भारत के लोकतान्त्रिक शासन के परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं,वो वास्तव में राजनीति नहीं वल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय,भारत में लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था स्थापित करने की अनावश्यक शीघ्रता के रूप में स्थापित एक अस्थायी शासन व्यवस्था है जिसको उसके अस्वीकार्य और दीर्घकाल तक न चल सकने वाले,इस रूप में अब स्वीकार नहीं किया जा सकता.इस महान लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था को बनाये रखने के लिए इसमें अब आवश्यक परिवर्तन आवश्य होने चाहिए नहीं तो ज्ञान के अभाव में इसी तरह लोग राजनीति जैसे महान और पवित्र शब्द को नकारात्मक रूप में देखने की भूल करते रहेंगे...अब मै ये बताना अपना कर्तव्य समझता हूँ की वास्तव में राजनीति का अर्थ क्या है,आपने कभी कौटिल्य की अर्थशास्त्र नामक पुस्तक का अध्ययन तो किया ही होगा, आपने अर्थशास्त्र का अध्ययन नहीं किया है तो अवश्य कर लीजये,,,और राजनीति का वास्तविक अर्थ समझने का प्रयास कीजये,अगर समझ में ना आये तो मै यंहा जो लिख रहा हूँ उसको ही राजनीति का वास्तविक अर्थ समझकर राजनीति जैसे महान शब्द को नमन कीजये,...कौटिल्य ने राजनीति की जो पुस्तक लिखी थी उसका नाम राजनीतिशास्त्र न रखकर उन्होंने अर्थशास्त्र रखा था,क्या आप जानते हैं की इसका अर्थ क्या हुआ,..इसका अर्थ ये हुआ की राजनीति मानव जीवन का वो तथ्य है जिसके द्बारा मनुष्य की साधारण दिनचर्या से लेकर राष्ट्रनीति-राष्ट्र की विदेश नीति-राज्य की आंतरिक व्यवस्था-और राष्ट्रीय आपदा-तथा वैश्विक सम्बन्ध जैसे सभी तत्त्व जुडे हुए रहते हैं,..राजनीति ही वो मार्गदर्शक और पथप्रदर्शक ज्ञान स्रोत है जिससे इन सभी संबंधों से उत्पन्न जटिल प्रशनों का उत्तर या[ अर्थ] मिलता है,अर्थात राजनीति का वास्तविक अर्थ हुआ मानव जीवन के उपरोक्त तत्वों का उत्तर या अर्थ देने वाला ज्ञान मार्ग.इसीलिए राजनीति शास्त्र को कौटिल्य ने अर्थशास्त्र नाम दिया था...अब इस बात पर आते हैं की राजनीति का जो रूप भारत में है वो वास्तव में राजनीति क्यों नहीं है... किया ही होगा.अब मुख्य प्रशन पर आते हैं..जो वर्तमान भारत में राजनीतिक संकट का रुप ले चुका है और वो आप केवल युवा ही हैं जो इसका उत्तर दे सकते हैं.वर्तमान संकट ये है की भारत में वर्तमान राजनीतिक स्वरुप को ही वास्तविक राजनीति समझकर प्रतिभावान और योग्य युवा पीढी ने इसको घृणा की दृष्टि से देखना प्रारंभ कर दिया है और स्वयम् को इससे बहुत दूर कर लिया है जिससे राष्ट्र को योग्य नेत्रत्व नहीं मिल पा रहा है.और भारत लगातार अयोग्य नेत्रत्व के हाथो में अपना भाग्य सौंपकर पतन की और जा रहा है.ये वर्तमान राजनीतिक दृष्टि से राजनीतिक और राष्ट्रीय संकट बन चुका है...जिसके समाधान के लिए हमें राजनीति को वोट नीति और नेता नीति न समझकर सभी मानवीय समस्याओं का समाधान दे सकने वाला अर्थशास्त्र समझकर उसमे अपनी भागीदारी करनी चाहिए...और आपको ये कभी नहीं भूलना चाहिए की अगर आप वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को सुधारने के लिए उसमे भगीदार नहीं बने तो आप उसके समर्थक तो हैं ही...अगर कोई ये समझता है की उसका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है,और उसको राजनीति को यूँ ही घृणा की द्रष्टि से देखकर संतोष मिल रहा है और वो ये समझता है कि वो राजनीति का किसी भी स्तर पर भागीदार नहीं है तो ये ऐसा समझने वाले की भूल है..क्योंकि आप अगर राजनीति के वर्तमान स्वरुप को सुधारने के लिए उसमे भागीदार नहीं हैं तो ऐसे लोग राजनीति के इस रुप के समर्थक तो हैं ही,क्योंकि...आप चाहे एम.बी.ए. हो या एम.सी.ए. हो,डॉक्टर हो या प्रोफेसर हो...या फिर बिजनेस मैन हो अगर आप गलत वर्तमान व्यवस्था का विरोध किये बिना,कोई जवाब मांगे बिना,कुछ नहीं तो टैक्स ही देते हैं तो भी आप इस वर्तमान अस्वीकार्य और पतित व्यवस्था के मूक समर्थक तो कहे ही जायेंगे.
इसीलिए मै आपका आवाहन करता हूँ की आप वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के मूक समर्थक ओर मूक दर्शक ना बने रहकर उसकों परिवर्तित और पुनर्निर्माण के लिए इस व्यवस्था में सम्मिलित हो जाएं,ओर जैसी व्यवस्था वास्तव मे आप चाहते हैं वैसी ही व्यवस्था का स्वयम् निर्माण कीजये....जय हिंद जय भारत..

gyan tatva!

नज़रें देश से चुराने की जिन्हें आदत है,अफसोस वही देश की आज विरासत हैं.


दिया कुछ नहीं जिन्होंने कभी दर्द के सिवा,आज उन्ही की हर तरफ सियासत है.

दो बूंद खून की कभी जिनकी गिरी नहीं,देश भक्तों से ही उनको अब शिकायत है.

विधाता ने क्या लिख दिया है मोल तेरा,गैरों की अमीरी पर उनकी नजारत है

ज्ञान तत्त्व

चिंता किसको आज यहाँ,माटी का क़र्ज़ चुकाने की.


कोशिस करते हैं सभी यहाँ,माता का दर्द बढाने की.

जिस पथ पर चलता जाता है नेतृत्व देश का आज सभी.

मुझको लगता है ये साजिश है भारत को भरमाने की.

ज्ञान तत्त्व !

क्षितिज सरोवर सूरज का उगते में आनंद लेता है.


रात ढलते ही लेकिन वो मयंक गान ही करता है.

उनके भावों को पढना क्या जो नित नयी रहा बदलते हैं.

सुखी पत्ति का साथ तो आखिर दया वृक्ष भी तजते हैं.

लेकिन मै कोई भंवरा नहीं हूँ फूलों का रस चखने वाला.

आज तुम्हारे साथ चला तो कल कोई नया बदल डाला.

मै तो सागर हूँ भाव भरा हूँ जल का कल नाद समझता हूँ.

मै दुरभिक्षों से अनभिज्ञ हूँ मै कभी नहीं बदलता हूँ.

मेरे आँगन से सूर्य--चन्द्र रोज यूँ ही गुजरते हैं.

बादल जल लेकर जाते हैं बस दान गान नहीं करते हैं.

देने को तो देता हूँ कितने ही मोती -भेद बिना.

मै ही वो अथाह जलधर हूँ जो सूखेगा नहीं मेघ बिना.

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

gyan tatva

सरदार भगत सिंह के फांसी के फंदे को चुमने से पहले उनकी आखिरी इच्छा पुछी गयी तब उन्होंने कहा:-"हम तीनो साथियों [सुखदेव,राजगुरु,और भगत सिंह] के हाथ खोल दिए जाएँ जिससे हम गले मिल सकें पता नहीं फिर कब तीनो की मुलाकात हो और न जाने किस रूप में हो" ये किसी के भी लिए बहुत महत्वपूर्ण बात है,जो भगत सिंह ने उपनिषदों में अध्ययन के बाद ज्ञान रूप में प्राप्त किया था,उपनिषदों में लिखा है अच्छे या बुरे कर्मों के अनुसार फल भोगने के लिए हर आत्मा मृत्यु के बाद फिर जन्म लेती है,और पिछले जन्म में उसके सहयोगी और साथी भी फिर से अगले जन्म में साथ-साथ उत्त्पन्न होकर वैसे ही अच्छे या बुरे कर्म करते हैं जैसे उन्होंने फिछले जन्म में साथ साथ किये थे,मै और मुझसे मिलने वाला मेरे साथ सहयोग करने वाला हर व्यक्ति हर जन्म में जहाँ भी जन्मा होगा उस राष्ट्र के लिए समर्पित रहा होगा,और अब समय आ गया है मेरे साथियों मेरे सन्देश का अर्थ समझिये और अति-शीघ्र मेरे साथ जुड़ जाएँ और मेरा सहयोग करें,वर्तमान में गंगा बचाओं अभियान और भारत की सामरिक शक्ति को अमेरिका के हितों के अनुसार कम करने के विरूद्व जन आन्दोलन कि आवश्यकता है,जिसके लिए मुझे आपका सहयोग चाहिए.

ज्ञान तत्त्व

केवल राजनीतिक रूप से लड़ने-झगड़ने से ही,संपूर्ण विकसित राष्ट्र और समाज का भारतीय स्वपन कभी पूरा नहीं हो सकता,क्योंकि इससे हानि तो केवल हम सब भारतवासियों की तथा भारत राष्ट्र की ही होगी और लाभ केवल अवसरवादी राजनेताओं का ही होगा.पिछडे तथा शोषित वर्ग के लोगों को यह समझना होगा की आखिर पिछले साठ वर्षों से आप लोगो की उन्नति और विकास क्यों बाधित ही,दलित आज भी क्यों दलित है पिछडा आज भी क्यों पिछडा ही है,कुछ राजनेताओं को क्यों आज भी गाँव-गाँव जन्हा आज भी पक्के मार्ग उन्होंने नहीं बनवाये हैं वहां पैदल जाकर दलित भुज और पिछडे भौजों का आयोजन करने की आवश्यकता पड़ रही है.

ज्ञान तत्त्व

लेकिन इससे समाज व्यवस्था मे कोई सकारात्मक परिवर्तन न होकर आज राष्ट्र के सम्मुख एक विघटनकारी तथा वर्ग-विभेदकारी वैमनस्यता का दानव मुह बाएँ खड़ा है,आज भी न तो पिछड़ों का विकास और उन्नति हुयी है और न ही,उनको सनातन हिन्दू तीर्थों व धार्मिक स्थलों मे समानता के आधार पर प्रवेश करने का अधिकार ही प्राप्त हुआ है,धार्मिक व सामाजिक रूप से अलग-थलग भारत का बहुसंख्यक पिछड़ा वर्ग राजनीतिक अवसरवादियों का शिकार बन रहा है तथा एक गलत दिशा मे उनकी उर्जा व प्रयास गलत दिशा me भटक raha है,उच्च वर्गों से लड़ाई-झगड़े मे उनकी उर्जा बर्बाद हो रही है जिससे एक ओर संपूर्ण समाज का तो दूसरी संपूर्ण राष्ट्र कि प्रगति बाधित हो अहि है,यह एक ध्यान देने योग्य बात है कि धार्मिक रूप से जागरूक नागरिक व समाज ही बौधिक और मानषिक भी रूप से भी उन्नत होते हैं.जिसके लिए भारत मे आज भी पिछडे वर्गों को सामाजिक व धार्मिक समानता तथा भेद-भाव रहित सामाजिक व्यवस्था कि आवश्यकता है.

ज्ञान तत्त्व

पिछड़े व शोषित वर्ग के समाज सुधारकों और महापुरुषों ने भारतीय सामाजिक व धार्मिक भेद-भाव तथा असमानता से खिन्न होकर उसके प्रति विरोध प्रकट करने के लिए या फिर किसी भी और अवश्यंभावी कारण से अपना धर्म तक परिवर्तित कर डाला,जिसका प्रारम्भ उच्च क्षत्रिय वर्ग लोगो द्बारा हुआ,जिनमे तीर्थंकरों ऋषभदेव और महावीर स्वामी द्बारा जैन धर्म का कि स्थापना,सिद्धार्थ जो बाद मे महात्मा बुद्ध कहलाये द्वारा बौध धर्म कि स्थापना तथा गुरु नानक जिन्होंने सिख धर्म को स्थापित किया प्रसिद्ध हैं और सभी का सम्बन्ध क्षत्रिय समाज या राज परिवारों से रहा है,इन्ही के धर्म को बाद मे दलित और शोषित तथा पिछड़े वर्ग के महापुरुषों व समाजसुधारकों ने भी अपना लिया और भारतीय सनातन धर्म से अलग होकर भारतीय समज व्यवस्था के प्रति अपना विरोध प्रकट किया.

ज्ञान तत्त्व

पिछड़े व शोषित वर्ग के समाज सुधारकों और महापुरुषों ने भारतीय सामाजिक व धार्मिक भेद-भाव तथा असमानता से खिन्न होकर उसके प्रति विरोध प्रकट करने के लिए या फिर किसी भी और अवश्यंभावी कारण से अपना धर्म तक परिवर्तित कर डाला,जिसका प्रारम्भ उच्च क्षत्रिय वर्ग लोगो द्बारा हुआ,जिनमे तीर्थंकरों ऋषभदेव और महावीर स्वामी द्बारा जैन धर्म का कि स्थापना,सिद्धार्थ जो बाद मे महात्मा बुद्ध कहलाये द्वारा बौध धर्म कि स्थापना तथा गुरु नानक जिन्होंने सिख धर्म को स्थापित किया प्रसिद्ध हैं और सभी का सम्बन्ध क्षत्रिय समाज या राज परिवारों से रहा है,इन्ही के धर्म को बाद मे दलित और शोषित तथा पिछड़े वर्ग के महापुरुषों व समाजसुधारकों ने भी अपना लिया और भारतीय सनातन धर्म से अलग होकर भारतीय समज व्यवस्था के प्रति अपना विरोध प्रकट किया.

ज्ञान तत्त्व

Thakur:लेकिन इससे समाज व्यवस्था मे कोई सकारात्मक परिवर्तन न होकर आज राष्ट्र के सम्मुख एक विघटनकारी तथा वर्ग-विभेदकारी वैमनस्यता का दानव मुह बाएँ खड़ा है,आज भी न तो पिछड़ों का विकास और उन्नति हुयी है और न ही,उनको सनातन हिन्दू तीर्थों व धार्मिक स्थलों मे समानता के आधार पर प्रवेश करने का अधिकार ही प्राप्त हुआ है,धार्मिक व सामाजिक रूप से अलग-थलग भारत का बहुसंख्यक पिछड़ा वर्ग राजनीतिक अवसरवादियों का शिकार बन रहा है तथा एक गलत दिशा मे उनकी उर्जा व प्रयास गलत दिशा me भटक raha है,उच्च वर्गों से लड़ाई-झगड़े मे उनकी उर्जा बर्बाद हो रही है जिससे एक ओर संपूर्ण समाज का तो दूसरी संपूर्ण राष्ट्र कि प्रगति बाधित हो अहि है,यह एक ध्यान देने योग्य बात है कि धार्मिक रूप से जागरूक नागरिक व समाज ही बौधिक और मानषिक भी रूप से भी उन्नत होते हैं.जिसके लिए भारत मे आज भी पिछडे वर्गों को सामाजिक व धार्मिक समानता तथा भेद-भाव रहित सामाजिक व्यवस्था कि आवश्यकता है.

ज्ञान तत्त्व

लेकिन इससे समाज व्यवस्था मे कोई सकारात्मक परिवर्तन न होकर आज राष्ट्र के सम्मुख एक विघटनकारी तथा वर्ग-विभेदकारी वैमनस्यता का दानव मुह बाएँ खड़ा है,आज भी न तो पिछड़ों का विकास और उन्नति हुयी है और न ही,उनको सनातन हिन्दू तीर्थों व धार्मिक स्थलों मे समानता के आधार पर प्रवेश करने का अधिकार ही प्राप्त हुआ है,धार्मिक व सामाजिक रूप से अलग-थलग भारत का बहुसंख्यक पिछड़ा वर्ग राजनीतिक अवसरवादियों का शिकार बन रहा है तथा एक गलत दिशा मे उनकी उर्जा व प्रयास गलत दिशा me भटक raha है,उच्च वर्गों से लड़ाई-झगड़े मे उनकी उर्जा बर्बाद हो रही है जिससे एक ओर संपूर्ण समाज का तो दूसरी संपूर्ण राष्ट्र कि प्रगति बाधित हो अहि है,यह एक ध्यान देने योग्य बात है कि धार्मिक रूप से जागरूक नागरिक व समाज ही बौधिक और मानषिक भी रूप से भी उन्नत होते हैं.जिसके लिए भारत मे आज भी पिछडे वर्गों को सामाजिक व धार्मिक समानता तथा भेद-भाव रहित सामाजिक व्यवस्था कि आवश्यकता है.
पिछड़े वर्ग के कुछ समाज सुधारकों ने कुछ ऐसे प्रयास किये जिसके कारण आज भारत को सामाजिक वर्ग संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है,इन महान पुरषों ने भारत की सामाजिक और धार्मिक असमानताओं के प्रति विरोध प्रकट करने के लिए धर्म तक परिवर्तित कर डाला जिसका भारत के समाज पर atyant विघटनकारी प्रभाव हुआ है,

ज्ञान तत्त्व

पिछड़े व शोषित वर्ग के समाज सुधारकों और महापुरुषों ने भारतीय सामाजिक व धार्मिक भेद-भाव तथा असमानता से खिन्न होकर उसके प्रति विरोध प्रकट करने के लिए या फिर किसी भी और अवश्यंभावी कारण से अपना धर्म तक परिवर्तित कर डाला,जिसका प्रारम्भ उच्च क्षत्रिय वर्ग लोगो द्बारा हुआ,जिनमे तीर्थंकरों ऋषभदेव और महावीर स्वामी द्बारा जैन धर्म का कि स्थापना,सिद्धार्थ जो बाद मे महात्मा बुद्ध कहलाये द्वारा बौध धर्म कि स्थापना तथा गुरु नानक जिन्होंने सिख धर्म को स्थापित किया प्रसिद्ध हैं और सभी का सम्बन्ध क्षत्रिय समाज या राज परिवारों से रहा है,इन्ही के धर्म को बाद मे दलित और शोषित तथा पिछड़े वर्ग के महापुरुषों व समाजसुधारकों ने भी अपना लिया और भारतीय सनातन धर्म से अलग होकर भारतीय समज व्यवस्था के प्रति अपना विरोध प्रकट किया,

ज्ञान तत्त्व

ज्ञान तत्त्व - [१]:--भारत वर्ष में वर्तमान में सामाजिक समानता के सारे छदम् प्रयास जो वास्तव में राजनीतिक वर्चस्व के लिए किये जा रहे हैं और इनमे सामाजिक क्रांति और समानता तथा भेद-भाव को समाप्त करने के लिए कोई तार्किक प्रयोजन नहीं है,अभी तक सवर्णों या उच्च वर्ग के लोगों से भारत के सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछडे लोगों में विद्वेष की भावना फैलाने के अतिरिक्त और किसी भी रूप मे फलीभूत नही हुए हैं,नकारात्मक राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ती के लिए बहुसंख्यक पिछडे वर्गों को सुनहरे स्वप्न दिखाकर उनको उच्च वर्गों के विरूद्ध एकत्रित करना ही केवल आधुनिक नेतृत्व का एक मात्र प्रयास है,जिसमे वचन भंग करना और झूठे वादे करना सफलता का एक आवश्यक तत्त्व है.राजनीति के वर्तमान स्वरुप मे ये विघटन कारी त्रुटी इसलिए है क्योकि हमारे भारत वर्ष के सारे कानून,विधियां और संविधान एक ऐसे विदेशी वर्ग के लोगों ने बनाई जहाँ पर आज इनको पूरी तरह से परिवर्तित किया जा चुका है,किसी राष्ट्र के समाज में समानता लाने के लिए सामाजिक भेद-भाव और धार्मिक समानता दो महत्व पूर्ण तत्त्व होते हैं,जिसके लिए अभी तक किसी ने कोई प्रयास नहीं किया है.