-राजनीति के मूक समर्थक मत बने रहिये:---राजनीति के मूक समर्थक कौन हैं,और मेरा संकेत किन लोगो की और है ये बात समझने से पहले इस बात को समझना जरूरी है की आखिर राजनीति वास्तव में क्या है?....राजनीति का वास्तविक अर्थ होता है राज्य की नीति,राष्ट्र की नीति,या फिर राजा और प्रजा की नीति,आज के परिवेश में जो राजनीति का स्वरूप आप भारत के लोकतान्त्रिक शासन के परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं,वो वास्तव में राजनीति नहीं वल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय,भारत में लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था स्थापित करने की अनावश्यक शीघ्रता के रूप में स्थापित एक अस्थायी शासन व्यवस्था है जिसको उसके अस्वीकार्य और दीर्घकाल तक न चल सकने वाले,इस रूप में अब स्वीकार नहीं किया जा सकता.इस महान लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था को बनाये रखने के लिए इसमें अब आवश्यक परिवर्तन आवश्य होने चाहिए नहीं तो ज्ञान के अभाव में इसी तरह लोग राजनीति जैसे महान और पवित्र शब्द को नकारात्मक रूप में देखने की भूल करते रहेंगे...अब मै ये बताना अपना कर्तव्य समझता हूँ की वास्तव में राजनीति का अर्थ क्या है,आपने कभी कौटिल्य की अर्थशास्त्र नामक पुस्तक का अध्ययन तो किया ही होगा, आपने अर्थशास्त्र का अध्ययन नहीं किया है तो अवश्य कर लीजये,,,और राजनीति का वास्तविक अर्थ समझने का प्रयास कीजये,अगर समझ में ना आये तो मै यंहा जो लिख रहा हूँ उसको ही राजनीति का वास्तविक अर्थ समझकर राजनीति जैसे महान शब्द को नमन कीजये,...कौटिल्य ने राजनीति की जो पुस्तक लिखी थी उसका नाम राजनीतिशास्त्र न रखकर उन्होंने अर्थशास्त्र रखा था,क्या आप जानते हैं की इसका अर्थ क्या हुआ,..इसका अर्थ ये हुआ की राजनीति मानव जीवन का वो तथ्य है जिसके द्बारा मनुष्य की साधारण दिनचर्या से लेकर राष्ट्रनीति-राष्ट्र की विदेश नीति-राज्य की आंतरिक व्यवस्था-और राष्ट्रीय आपदा-तथा वैश्विक सम्बन्ध जैसे सभी तत्त्व जुडे हुए रहते हैं,..राजनीति ही वो मार्गदर्शक और पथप्रदर्शक ज्ञान स्रोत है जिससे इन सभी संबंधों से उत्पन्न जटिल प्रशनों का उत्तर या[ अर्थ] मिलता है,अर्थात राजनीति का वास्तविक अर्थ हुआ मानव जीवन के उपरोक्त तत्वों का उत्तर या अर्थ देने वाला ज्ञान मार्ग.इसीलिए राजनीति शास्त्र को कौटिल्य ने अर्थशास्त्र नाम दिया था...अब इस बात पर आते हैं की राजनीति का जो रूप भारत में है वो वास्तव में राजनीति क्यों नहीं है... किया ही होगा.अब मुख्य प्रशन पर आते हैं..जो वर्तमान भारत में राजनीतिक संकट का रुप ले चुका है और वो आप केवल युवा ही हैं जो इसका उत्तर दे सकते हैं.वर्तमान संकट ये है की भारत में वर्तमान राजनीतिक स्वरुप को ही वास्तविक राजनीति समझकर प्रतिभावान और योग्य युवा पीढी ने इसको घृणा की दृष्टि से देखना प्रारंभ कर दिया है और स्वयम् को इससे बहुत दूर कर लिया है जिससे राष्ट्र को योग्य नेत्रत्व नहीं मिल पा रहा है.और भारत लगातार अयोग्य नेत्रत्व के हाथो में अपना भाग्य सौंपकर पतन की और जा रहा है.ये वर्तमान राजनीतिक दृष्टि से राजनीतिक और राष्ट्रीय संकट बन चुका है...जिसके समाधान के लिए हमें राजनीति को वोट नीति और नेता नीति न समझकर सभी मानवीय समस्याओं का समाधान दे सकने वाला अर्थशास्त्र समझकर उसमे अपनी भागीदारी करनी चाहिए...और आपको ये कभी नहीं भूलना चाहिए की अगर आप वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को सुधारने के लिए उसमे भगीदार नहीं बने तो आप उसके समर्थक तो हैं ही...अगर कोई ये समझता है की उसका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है,और उसको राजनीति को यूँ ही घृणा की द्रष्टि से देखकर संतोष मिल रहा है और वो ये समझता है कि वो राजनीति का किसी भी स्तर पर भागीदार नहीं है तो ये ऐसा समझने वाले की भूल है..क्योंकि आप अगर राजनीति के वर्तमान स्वरुप को सुधारने के लिए उसमे भागीदार नहीं हैं तो ऐसे लोग राजनीति के इस रुप के समर्थक तो हैं ही,क्योंकि...आप चाहे एम.बी.ए. हो या एम.सी.ए. हो,डॉक्टर हो या प्रोफेसर हो...या फिर बिजनेस मैन हो अगर आप गलत वर्तमान व्यवस्था का विरोध किये बिना,कोई जवाब मांगे बिना,कुछ नहीं तो टैक्स ही देते हैं तो भी आप इस वर्तमान अस्वीकार्य और पतित व्यवस्था के मूक समर्थक तो कहे ही जायेंगे.
इसीलिए मै आपका आवाहन करता हूँ की आप वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के मूक समर्थक ओर मूक दर्शक ना बने रहकर उसकों परिवर्तित और पुनर्निर्माण के लिए इस व्यवस्था में सम्मिलित हो जाएं,ओर जैसी व्यवस्था वास्तव मे आप चाहते हैं वैसी ही व्यवस्था का स्वयम् निर्माण कीजये....जय हिंद जय भारत..
सोमवार, 16 नवंबर 2009
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