गुरुवार, 12 नवंबर 2009

ज्ञान तत्त्व

लेकिन इससे समाज व्यवस्था मे कोई सकारात्मक परिवर्तन न होकर आज राष्ट्र के सम्मुख एक विघटनकारी तथा वर्ग-विभेदकारी वैमनस्यता का दानव मुह बाएँ खड़ा है,आज भी न तो पिछड़ों का विकास और उन्नति हुयी है और न ही,उनको सनातन हिन्दू तीर्थों व धार्मिक स्थलों मे समानता के आधार पर प्रवेश करने का अधिकार ही प्राप्त हुआ है,धार्मिक व सामाजिक रूप से अलग-थलग भारत का बहुसंख्यक पिछड़ा वर्ग राजनीतिक अवसरवादियों का शिकार बन रहा है तथा एक गलत दिशा मे उनकी उर्जा व प्रयास गलत दिशा me भटक raha है,उच्च वर्गों से लड़ाई-झगड़े मे उनकी उर्जा बर्बाद हो रही है जिससे एक ओर संपूर्ण समाज का तो दूसरी संपूर्ण राष्ट्र कि प्रगति बाधित हो अहि है,यह एक ध्यान देने योग्य बात है कि धार्मिक रूप से जागरूक नागरिक व समाज ही बौधिक और मानषिक भी रूप से भी उन्नत होते हैं.जिसके लिए भारत मे आज भी पिछडे वर्गों को सामाजिक व धार्मिक समानता तथा भेद-भाव रहित सामाजिक व्यवस्था कि आवश्यकता है.

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