सोमवार, 16 नवंबर 2009

ज्ञान तत्त्व !

क्षितिज सरोवर सूरज का उगते में आनंद लेता है.


रात ढलते ही लेकिन वो मयंक गान ही करता है.

उनके भावों को पढना क्या जो नित नयी रहा बदलते हैं.

सुखी पत्ति का साथ तो आखिर दया वृक्ष भी तजते हैं.

लेकिन मै कोई भंवरा नहीं हूँ फूलों का रस चखने वाला.

आज तुम्हारे साथ चला तो कल कोई नया बदल डाला.

मै तो सागर हूँ भाव भरा हूँ जल का कल नाद समझता हूँ.

मै दुरभिक्षों से अनभिज्ञ हूँ मै कभी नहीं बदलता हूँ.

मेरे आँगन से सूर्य--चन्द्र रोज यूँ ही गुजरते हैं.

बादल जल लेकर जाते हैं बस दान गान नहीं करते हैं.

देने को तो देता हूँ कितने ही मोती -भेद बिना.

मै ही वो अथाह जलधर हूँ जो सूखेगा नहीं मेघ बिना.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें